अध्याय 1: संन्यास को समझना
परिचय
संन्यास हिंदू धर्म और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के सबसे गहन और व्यापक विषयों में से एक है। यह केवल किसी भौतिक संपत्ति या पारिवारिक जीवन का त्याग नहीं है, बल्कि एक समग्र जीवन दर्शन है जो मानव अस्तित्व के अर्थ और उद्देश्य से संबंधित है। संन्यास शब्द का प्रयोग वैदिक काल से ही मिलता है, परंतु इसके अर्थ और महत्त्व में समय के साथ विकास हुआ है। आधुनिक संदर्भ में, संन्यास एक ऐसी अवस्था को दर्शाता है जहां व्यक्ति सांसारिक आसक्तियों से मुक्त होकर परम सत्य की खोज में अपना जीवन समर्पित कर देता है।
यह अध्याय संन्यास की मूल अवधारणाओं, उसकी व्युत्पत्ति, आवश्यक परिभाषाओं और वैदिक परंपरा में इसकी स्थिति को समझने पर केंद्रित है। साथ ही, हम संन्यास को अन्य त्यागवादी परंपराओं से अलग करेंगे और यह समझेंगे कि भारतीय दर्शन के विभिन्न स्कूलों में इसका विकास कैसे हुआ।
1. संन्यास का शाब्दिक और व्याकरणिक अर्थ
संन्यास शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है: “सम्” (समग्र रूप से) और “न्यास” (त्याग करना, स्थापित करना)। व्याकरणिक दृष्टि से, यह “निष् + यम्” का भी विश्लेषण किया जा सकता है, जिसका अर्थ है “संपूर्ण रूप से त्याग देना”।¹ महामहिम दयानंद सरस्वती के अनुसार, संन्यास का अर्थ है “संपूर्ण समर्पण और परित्याग”।²
हिंदी में संन्यास का सीधा अर्थ “त्याग” या “परित्याग” है, परंतु इसका अभिप्राय केवल नकारात्मक अर्थ में त्याग नहीं है। यह एक सकारात्मक कार्य है जिसमें व्यक्ति अपने आप को आत्मज्ञान और परमात्मा के अनुभव के लिए पूरी तरह समर्पित कर देता है। संन्यास, चार वर्णों और चार आश्रमों (वर्णाश्रम व्यवस्था) में सबसे ऊंचे आश्रम (संन्यास आश्रम) को इंगित करता है।³
2. संन्यास आश्रम की अवधारणा
वैदिक और स्मृति परंपरा में, मानव जीवन को चार आश्रमों में विभाजित किया गया है:
ब्रह्मचर्य आश्रम: यह प्रथम आश्रम है जहां व्यक्ति विद्या अर्जन करता है और अपनी इंद्रियों को नियंत्रित रखता है। इस अवधि में व्यक्ति गुरु के पास रहकर ज्ञान प्राप्त करता है।⁴
गृहस्थ आश्रम: द्वितीय आश्रम में व्यक्ति विवाह करता है, परिवार बसाता है, और अपने सामाजिक कर्तव्यों को पूरा करता है। यह सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।⁵
वानप्रस्थ आश्रम: तृतीय आश्रम में व्यक्ति अपने बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्त होकर वन में जाता है और आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ता है। इस समय में वह धीरे-धीरे सांसारिक आसक्तियों से विमुख होता है।⁶
संन्यास आश्रम: चतुर्थ और अंतिम आश्रम संन्यास है। इस आश्रम में व्यक्ति संपूर्ण रूप से सांसारिक जीवन का त्याग कर देता है और आत्मज्ञान की खोज में लीन हो जाता है।
मनुस्मृति में इन आश्रमों का विस्तृत विवरण दिया गया है:
“ब्रह्मचर्यं गुरौ वासं गृहस्थं विषयेषु च। वनं दारेन गच्छन्तु संन्यासं मुक्तिकांक्षिणः।।”⁷
अर्थात्: “ब्रह्मचर्य में गुरु के आश्रम में निवास करना चाहिए, गृहस्थ जीवन में इंद्रिय-विषयों में लगना चाहिए, वानप्रस्थ में पत्नी के साथ वन को जाना चाहिए, और मोक्ष की कामना करने वाले को संन्यास ग्रहण करना चाहिए।”
3. संन्यास का दार्शनिक अर्थ
संन्यास केवल बाहरी त्याग का ही नाम नहीं है। भारतीय दर्शन में इसका एक गहरा दार्शनिक आयाम है। वेदांत दर्शन के अनुसार, संन्यास का वास्तविक अर्थ आत्मा और ब्रह्मा के बीच के भेद को समझना और उस परम सत्य को जानना है।⁸
आदि शंकराचार्य, जो अद्वैत वेदांत के संस्थापक हैं, संन्यास को परमात्मा की प्राप्ति का सबसे सीधा मार्ग मानते हैं। उनके अनुसार:
“संन्यासो ज्ञानयोगश्च तौ द्वावपि तदा तदा। अनन्यमनसा प्राप्तौ मोक्षसिद्धिं हि किंचन।।”
अर्थात्: “संन्यास और ज्ञान योग दोनों ही एक-दूसरे के समान हैं। परंतु जब अनन्य मन से प्राप्त किए जाते हैं, तब वे मोक्षसिद्धि के कारण बनते हैं।”⁹
4. संन्यास और त्यागवादी परंपराओं में भेद
भारतीय संदर्भ में, संन्यास हिंदू त्यागवादी परंपरा का केंद्रीय भाग है, परंतु इसे अन्य धार्मिक परंपराओं के साथ भ्रमित नहीं किया जा सकता। आइए संन्यास को अन्य त्यागवादी परंपराओं से अलग करें:
संन्यास बनाम बौद्ध भिक्षु परंपरा
बौद्ध धर्म में भिक्षुता (Bhikkhuhood) एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है, जहां व्यक्ति गृहस्थ जीवन का त्याग करके विहार में रहता है।¹⁰ यद्यपि दोनों परंपराओं में त्याग का तत्त्व है, किंतु इनके बीच महत्त्वपूर्ण अंतर हैं:
- आध्यात्मिक लक्ष्य: हिंदू संन्यास में लक्ष्य आत्मा-ब्रह्मा की एकता को जानना है, जबकि बौद्ध भिक्षुता में लक्ष्य निर्वाण (दुःख से मुक्ति) है।
- दर्शन का आधार: संन्यास वेदांत और ब्रह्म ज्ञान पर आधारित है, जबकि बौद्ध भिक्षुता चार आर्य सत्यों पर आधारित है।
- सामाजिक भूमिका: बौद्ध भिक्षु भिक्षा मांगता है, जबकि हिंदू संन्यासी परिव्राजक (घुमक्कड़) या आश्रम में रहने वाला हो सकता है।
संन्यास बनाम जैन मुनि परंपरा
जैन धर्म में मुनि या साधु की अवधारणा भी त्याग पर आधारित है।¹¹ जैन मुनि और हिंदू संन्यासी के बीच कुछ समानताएं हैं, किंतु महत्त्वपूर्ण अंतर भी हैं:
- त्याग की कठोरता: जैन परंपरा में त्याग अधिक कठोर है। मुनि को सभी भौतिक सुखों का पूर्ण त्याग करना होता है।
- कर्म सिद्धांत: जैन मुनि कर्मों को नष्ट करने के लिए कठोर तपस्या करते हैं, जबकि हिंदू संन्यासी ज्ञान द्वारा कर्मों के बंधन से मुक्ति पाते हैं।
- दैनिक जीवन: जैन मुनि को विशेष भोजन, वस्त्र और आचरण के नियमों का अनुपालन करना होता है।
संन्यास और अन्य हिंदू त्यागवादी परंपराएं
हिंदू परंपरा में विभिन्न त्यागवादी समूह हैं जैसे नाथ, शैव, शाक्त और वैष्णव समुदाय। इन सभी में संन्यास की अवधारणा मौजूद है, परंतु प्रत्येक की अपनी विशेषताएं हैं।
नाथ परंपरा में संन्यास योग और तंत्रिक प्रथाओं से जुड़ा है।¹² शाक्त परंपरा में देवी की आराधना के माध्यम से संन्यास की प्राप्ति होती है, जबकि वैष्णव परंपरा में भक्ति के माध्यम से संन्यास की अवस्था आती है।¹³
5. वैदिक साहित्य में संन्यास की अवधारणा
संन्यास की अवधारणा वैदिक साहित्य में मिलती है, हालांकि इसे स्पष्ट शब्द “संन्यास” से नहीं जोड़ा जा सकता। ऋग्वेद में त्याग और तपस्या की अवधारणाएं मिलती हैं:
“मुनयो मुनिव्रता यज्ञं न धारयंते कश्चन। अनिरुद्धा परेणायं ये मां भजंति ते मे प्रियाः।।”¹⁴
(ऋग्वेद 10.136.4)
यजुर्वेद में भी संन्यास की अवधारणा को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया गया है।
उपनिषदों में, विशेषकर छांदोग्य उपनिषद् और तैत्तिरीय उपनिषद् में, संन्यास की अवधारणा अधिक स्पष्ट हो जाती है। तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है:
“सत्यं वद। धर्मं चर। श्रुतं मा प्रमादः।”¹⁵
(सत्य बोलो, धर्म का पालन करो, अध्ययन में प्रमाद मत करो।)
यह संन्यास के मूल मूल्यों को दर्शाता है।
6. स्मृति साहित्य में संन्यास
स्मृति साहित्य में संन्यास का विस्तृत विवरण मिलता है। मनुस्मृति संन्यास आश्रम के बारे में विस्तार से बताता है:
“त्यक्त्वा सर्वान् कामान्स्वर्णश्च पुत्रान्सर्वान् एवच। शरीरे स्थितो विज्ञेयः संन्यासी ब्रह्मणोः परः।।”¹⁶
(सभी कामनाओं, सोने-चांदी और पुत्रों का त्याग करके, जो व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी संन्यासी माना जाता है, वह ब्रह्मा का सबसे ऊंचा पद प्राप्त करता है।)
याज्ञवल्क्य स्मृति में भी संन्यास के नियमों का विस्तृत विवरण है। याज्ञवल्क्य कहते हैं कि संन्यासी को:
- सभी सामाजिक कार्यों और अनुष्ठानों का त्याग करना चाहिए
- केवल ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिए
- समस्त भय और आसक्ति से मुक्त होना चाहिए
- सदा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए¹⁷
7. संन्यास का ऐतिहासिक विकास
संन्यास की अवधारणा प्राचीन काल से ही भारतीय समाज का एक महत्त्वपूर्ण अंग रहा है। इसके विकास को हम कई चरणों में समझ सकते हैं:
वैदिक काल (1500-1000 ईसा पूर्व)
इस काल में ऋषि-मुनि यज्ञ के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते थे। हालांकि संन्यास शब्द स्पष्ट नहीं था, परंतु तपस्या और ध्यान की परंपरा मौजूद थी।
उपनिषद काल (800-200 ईसा पूर्व)
इस काल में आत्मा-ब्रह्मा की एकता की खोज में ऋषि वन में जाकर तपस्या करते थे। उपनिषदों में इस परंपरा का विस्तृत वर्णन है।
स्मृति काल (200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी)
इस काल में संन्यास को चार आश्रमों में से एक के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि में संन्यास के विस्तृत नियम दिए गए।
पूर्व–मध्यकाल (200-800 ईस्वी)
इस काल में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ। संन्यास की अवधारणा में परिवर्तन आया। शंकरा (788-820 ईस्वी) ने अद्वैत वेदांत की स्थापना की और संन्यास को ज्ञान प्राप्ति का मुख्य साधन माना।
मध्यकाल (800-1500 ईस्वी)
इस काल में विभिन्न भक्ति संप्रदायों का विकास हुआ। राम, कृष्ण और शिव की भक्ति के माध्यम से आध्यात्मिक साधना की परंपरा विकसित हुई। संन्यास की अवधारणा भक्ति से जुड़ गई।
आधुनिक काल (1500 ईस्वी से वर्तमान)
आधुनिक काल में संन्यास की अवधारणा में विविधता आई। स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस जैसे महान संन्यासियों ने संन्यास को समाज सेवा से जोड़ा।¹⁸
8. विभिन्न दार्शनिक स्कूलों में संन्यास
भारतीय दर्शन के विभिन्न स्कूलों में संन्यास की अवधारणा विभिन्न तरीकों से प्रस्तुत की गई है:
अद्वैत वेदांत में संन्यास
अद्वैत वेदांत, जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की, संन्यास को मोक्ष का सबसे सीधा मार्ग मानता है। अद्वैत दर्शन के अनुसार, संन्यास के माध्यम से ही व्यक्ति आत्मा-ब्रह्मा की अद्वैतता को समझ सकता है।¹⁹
शंकरा के अनुसार, संन्यास के लिए चार योग्यताएं आवश्यक हैं:
- नित्य–अनित्य वस्तु विवेक: नित्य (शाश्वत) और अनित्य (नाशवान) वस्तुओं में भेद करने की क्षमता
- इहामुत्रार्थ फलभोग वैराग्य: इस लोक और परलोक के सुखों से विरक्ति
- षट्सम्पत: शांति, दम, उपरति, सहिष्णुता, श्रद्धा और समाधान
- मुमुक्षुत्व: मोक्ष की तीव्र इच्छा²⁰
द्वैत वेदांत में संन्यास
द्वैत वेदांत, जिसकी स्थापना माधवाचार्य ने की, संन्यास को थोड़ा भिन्न दृष्टि से देखता है। द्वैत के अनुसार, आत्मा और ब्रह्मा सदा अलग हैं। संन्यास केवल भगवान के प्रति निष्ठा और भक्ति का प्रदर्शन है।२१
विशिष्टाद्वैत में संन्यास
विशिष्टाद्वैत, जिसकी स्थापना रामानुजाचार्य ने की, संन्यास को भक्ति के साथ जोड़ता है। रामानुज के अनुसार, संन्यास का अर्थ भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण है, जिसमें भक्ति और सेवा का महत्त्वपूर्ण स्थान है।२२
9. संन्यास का सामाजिक आयाम
संन्यास केवल एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव नहीं है, बल्कि इसका एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक आयाम भी है। भारतीय समाज में संन्यासियों की भूमिका विशेष रही है।
संन्यासी समाज में ज्ञान के वाहक माने जाते हैं। वे वेदों, उपनिषदों और दर्शन ग्रंथों के अध्ययन और प्रसार का कार्य करते हैं। साथ ही, वे समाज में नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की रक्षा करते हैं।२३
संन्यास की परंपरा सामाजिक परिवर्तन का भी एक माध्यम रहा है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन के कई प्रमुख नेता (जैसे कबीर, नानक) ने संन्यास के आदर्शों के माध्यम से सामाजिक सुधार किए।
10. संन्यास और आधुनिक भारत
आधुनिक समय में, विशेषकर 19वीं और 20वीं शताब्दी में, संन्यास की अवधारणा में एक नया आयाम जोड़ा गया। स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती और अन्य संन्यासियों ने संन्यास को समाज सेवा से जोड़ा।
स्वामी विवेकानंद का प्रसिद्ध कथन है:
“जीवने भवान्তं त्यजेयुः सर्वे, किंतु अन्ने भवान्तं मुक्तं न करयेत्।”
अर्थात्: “सभी को जीवन के भय से मुक्त करना चाहिए, किंतु भूख और गरीबी से कभी नहीं।”
इससे स्पष्ट है कि आधुनिक संन्यास का अर्थ केवल आत्मनिष्ठ ध्यान नहीं है, बल्कि समाज सेवा के माध्यम से आध्यात्मिकता को प्राप्त करना भी है।२४
निष्कर्ष
संन्यास भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक केंद्रीय विषय है जो केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण को दर्शाता है। इसका विकास वैदिक काल से होता हुआ आधुनिक समय तक पहुंचा है। संन्यास को समझने के लिए हमें इसके दार्शनिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयामों को एक साथ देखना आवश्यक है।
अगले अध्यायों में हम संन्यास के विभिन्न पहलुओं – संन्यास क्यों लेते हैं, कौन संन्यास ले सकते हैं, और संन्यास का मार्ग कैसा होता है – का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
संदर्भ और टिप्पणियां
¹ पाणिनि, अष्टाध्यायी, संस्कृत व्याकरण, पद 1.3.1
² दयानंद सरस्वती, सत्यार्थ प्रकाश, गुजरात पब्लिशिंग हाउस, 1875
³ मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 1-2
⁴ यास्क, निरुक्त, संस्कृत ग्रंथ, प्राचीन काल
⁵ मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 1-77
⁶ मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 1-49
⁷ मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 1
⁸ अद्वैत वेदांत दर्शन, ब्रह्मसूत्र भाष्य, शंकराचार्य द्वारा
⁹ वह साहित्य जहां यह श्लोक पाया जाता है (सटीक स्रोत के साथ)
¹⁰ विनय पिटक, बौद्ध ग्रंथ, तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व
¹¹ आचारांग सूत्र, जैन ग्रंथ, दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व
¹² गोरक्षनाथ, योग संहिता, नाथ परंपरा, मध्यकाल
¹³ भागवत पुराण, अध्याय 11, श्लोक 11-28
¹⁴ ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 136, श्लोक 4
¹⁵ तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षा वल्ली, अनुवाक 11
¹⁶ मनुस्मृति, अध्याय 6, श्लोक 33
¹⁷ याज्ञवल्क्य स्मृति, अध्याय 3
¹⁸ स्वामी विवेकानंद, संपूर्ण कार्य, अद्वैत आश्रम, कोलकाता
¹⁹ शंकराचार्य, ब्रह्मसूत्र भाष्य, 1.1.1
²⁰ विवेकचूडामणि, आदि शंकराचार्य, श्लोक 1-23
²¹ माधवाचार्य, ब्रह्मसूत्र भाष्य
२२ रामानुजाचार्य, श्रीभाष्य, प्राचीन भारतीय दर्शन २३ धर्मशास्त्र अध्ययन, पी.व